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नज़्म

गिला नहीं है उससे , न ही कोई शिकायत है, बस इस डर से उसे नजरअंदाज करता हूं कि एक दफा जो उसे देख लिया, मेरे हजारों ज़रूरी काम उसके भीगे लबों पर जा अटकते हैं । ये फैलती दुनिया, हमें घूरते लोग, सही गलत की बाते, अच्छे बुरे का शौक सब उसकी नशीली आंखो में जा सिमटते हैं। कभी स्टडी टेबल पर बैठ भी गया तो क्या,  दिमाग में मैथ्स के फॉर्मूले और उसके चहरे के बीच एक जंग सी छिड़ जाती है। हवाओं का रुख तो बदलना ही था  फिजाओं का सुरूर तो बढ़ना ही था उसका गोरा-बदन और ब्लैक-सूट  किसी कयामत से कम नहीं । उसके एक इशारे पर न जाने कितने अनपढ़ किताब लेकर कॉलेज के रास्ते चले आते हैं न जाने कितनो ने चाकू फेककर फूल थाम लिया न जाने कितनों का वास्ता नज़्मों, गजलों से हो गया न जाने कितने मुसाफिर उसे मंजिल समझ कर तय करते हैं। लेकिन उसे क्या परवाह अपने चाहने वालों की वो तो अपना नंबर देकर भी डिलीट करने पर मजबूर कर देती है उसे क्या परवाह कि वो किसी को थैंक्स बोले लोग जो खुद उस पर एहसान करने को तरसते हैं । दीवाने सोचते हैं अगर उससे मुलाकात हो तो, उसे जी भर देखें या उससे बातें करें। ...