चौथा आयाम (व्यंग्य)

 


मैं चौथे आयाम में हूँ चौथा आयाम फोर्थ डायमेंशन ।मेरे और चौथे आयाम के अस्तित्व के बारे में ज्यादा सोचना मत दिमाग का दही हो जाएगा। मैं कठिन और जटिल हूँ मैं अभी तक थर्ड डायमेंशन में स्थित तुम लोगों के लिए एक अनसुलझी पहेली हूँ जिसे सुलझाने में दिमाग सूज जाएगा। मैं जहाँ रहता हूँ अर्थात चौथा आयाम उसे समझने के लिए हजारों भौतिकशास्त्री कई दशकों से दिन रात अथक प्रयास कर रहें हैं। वही प्रयास जो अज्ञानी के लिए समय की बर्बादी हो सकता है। दरअसल वे व्यक्ति जो छैनी-हथोड़ा से पहाड़ को पत्थर बनाने का काम करते है उनके लिए कॉपी पेन लेकर समस्या हल करना या कंप्युटर स्क्रीन पर काम करना कोई काम नहीं। उन्हें क्या पता समस्या चाहे गणित का हो या एक वक़्त का रोटी जुटाने का समस्या तो समस्या होता है । समस्या इतना भारी हो जाता है कि लोग दब कर मर जाते हैं । कई लोगों के लिए ऐसा काम जिसे करने में पसीना न छूट जाए फोकट का तनखा लेना होता है।उन बुद्धूओं को क्या पता कि ब्राम्हण का मात्र 1 समीकरण हल करने में एक एक वैज्ञानिक का पूरा जीवन गुजर जाता है । दिमाग में भारी समस्या लेकर गुजर बसर करना 100 केजी का भार उठा कर पहाड़ चढ़ने से कम नहीं। वैज्ञानिकों की महत्वाकांक्षा का आदर करना चाहिए 1 ओर कई लोग कुआं के मेढ़क के समान घर से नहीं निकलते और 1 वो हैं जो धरती से दूर दूसरे ग्रह से घूम आते हैं। वैसे वो लोग जो दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं देते और जिन्हों ने अपने दिमाग का मात्र 0.025 % ही उपयोग किया है उनके लिए तो मेरा और फोर्थ डायमेंशन का सपने में भी कोई अस्तित्व नहीं है । वैसे भी मानवीय प्रवृत्ति ही ऐसा होता है कि जिसे कर न सको और जो समझ से परे हो उसे नकार दो। मुझे पता है यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो कभी ये नहीं सोचते कि दुनिया गोल है या चौकोर या चपटी हालांकि पड़ोसन से गोल रोती नहीं बनती ये भलीभांति पता है। 


मेरा नाम मत पूछना क्योंकि नाम बताऊँगा तो जात जानने की इच्छा होगी और फिर जात का सीधा संबंध आरक्षण से होता है और आरक्षण व्यक्ति का रैंकिंग उसके कर्मों से नहीं उसके जात से करता है। चौथे आयाम में ऐसा नहीं है यहां लोगों का न ही नाम होता है न ही जात। यहाँ सिर्फ़ लोगों का पहचान होता है। पहचान के लिए हर
व्यक्ति के माथे पर छोटा सा चौकोर डिस्प्ले लगा होता है जिसमें व्यक्ति का नम्बर लिखा होता है और नम्बर भी बुद्धिमत्ता के अनुसार बदलते रहता। नहीं समझे, मैं बताता हूँ जैसे जो व्यक्ति सबसे ज्यादा बुद्धिमान, प्रतिभावान, कलाकार और सद्गुणों से निपुण
है उसका नाम 1 होगा जो डिस्प्ले में दिखता है। उससे कम बुद्धिमान का नाम 2 ऐसा क्रम चलता रहता है। और ऐसा नहीं कि एक बार नाम मिल गया तो मरते दम तक वही नाम रहेगा।
जैसे तीसरे आयाम में एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो मस्त तनख्वा लो चाहे काम करो या न करो। यहां ऐसा नहीं है
व्यक्ति का नाम काम के हिसाब से बदलता रहता है।
1 नाम वाला इंसान अगर कुछ अनैतिक कार्य करता है तो उसका रैंकिंग 10-12 में हो जाएगा और फिर अगर अच्छा काम करेगा तो पुनः पहले रैंक में आ जायेगा और उसका नाम 1 हो जाएगा । मतलब
पाप का फल तुरंत मिल जाएगा। दरअसल यहाँ हर व्यक्ति का लिंक नेटवर्क के एक ही क्लाउड से होता है
जहाँ एक संगणक इंसान के कर्मों के हिसाब से रैंकिंग कर उसका नाम डिस्प्ले करता है। मेरा नाम अभी 75.01 है। मतलब मेरा रैंकिंग 75 है और इसका कारण यह है कि मैं आज कल दूसरों के ताक झाक में ज्यादा रहता हूँ।
जोकि यहाँ जघन्य अपराध है।

यहां हर व्यक्ति का रंग एक समान सफेद होता है। रंग में भिन्नता केवल दिमाग का होता है जो व्यक्ति के सोच के साथ बदला रहता है। जैसे उच्च विचार वाले व्यक्ति के दिमाग का रंग सफेद। माध्यम वाले का मटमैली और निम्न विचार वाले व्यक्ति के दिमाग का रंग काला होता है। और ऐसा भी नहीं की उच्च विचार वाले व्यक्ति के दिमाग का रंग हमेशा सफेद ही रहेगा। अगर उसके भी विचार में दोष आता है तो दिमाग का रंग मटमैला होना शुरू हो जाता है। मतलब यहां किसी को उल्टी टोपी पहना पाना असंभव है क्योंकि सामने वाले का दिमाग का रंग देख कर भनक लग जाएगा ।
तुम्हारी दुनिया में बिल्कुल विपरित है पहली नजर में तुम सब रंग और सुंदरता देखते हो और व्यक्ति के विचार को नजरअंदाज कर देते हो। स्वेत और
अश्वेत दोनों का ही अलग वर्ग होता है सिर्फ रंग देखकर ।
काले सज्जन व्यक्ति को तिरस्कार मिलता है और गोरे दुर्जन को पुरूस्कार।


मेरी दुनिया भी धरती ही है लेकिन क्योंकि मैं चौथे आयाम में हूँ इस लिए मेरी शक्ति तुमसे 1000 गुना अधिक है।
तुम मुझे न देख सकते हो न सुन सकते हो हालांकि मैं तुम्हें भलीभांति देख, सुन सकता हूँ । जैसे तुम मनोरंजन के लिए पड़ोसी की लड़ाई देखते हो या चलचित्र, और सोशल मिडिया का उपयोग करते हो मैं भी खाली समय में मनोरंजन के लिए तुम्हारे कृत्य देखता हूँ । जैसे तुम इमोशनल फिल्म देख कर रोते हो कॉमेडी फिल्म देख कर हँसते हो और नीला चलचित्र देख कर अपने अंदर के शैतान को जागृत करते हो ।
ठीक वैसे ही मैं भी चौथे आयाम से तुम्हारी करतूतों को देख कर हँसता रोता रहता हूँ।
मैं हमेशा तुम्हारे आसपास ही रहता हूँ जब तुम कुछ अनैतिक कार्य करते हो तो तुम्हारे मन मे ख्याल आता है कि कोई देख तो नहीं रहा । हाँ कोई देख रहा है, मैं देख रहा हूँ। बहुत है तुमसे ऊपरी आयाम में जो देख रहे हैँ ।
जिसे तुम नहीं देख सकते। घूस लेते हुए भले ही तुम रंगे हाथ न पकड़े जाओ लेकिन मेरी दृष्टि मे तुम्हारा हाथ तो अभी भी रंगा हुआ है। मैं तुम्हारे सफेद कमीज के आस्तीन का काला साँप भी आसानी से देख सकता हूँ जिसे तुम अपने ही अजीज के लिए जाने अनजाने पाल रहे हो। जब तुम अपना ऐसा हाथ घनिष्ट मित्र के लिए बढ़ाते हो तो मैं तुम्हारे आस्तीन का साँप देख कर डर जाता है ठीक वैसे ही जैसे तुम हॉरर फिल्म देख कर डर जाते हो।

मैं बहुत हँसता जब तुम किसे के लिए गड्ढा खोदते हो और उसमे गिर कर खुद मर जाते हो।
याद करो उस व्यक्ति को जिसे तुमने झूठ बोला है या कोई बड़ा राज छुपा है । तुम वफादार होने का नाटक करते हो लेकिन उसे अगर यह बात जीवन पर्यंत पता नहीं चलता तो तुमने झूठ किसे बोला उसे या ख़ुद को।

मैं समाज के ऐसे मुखिया और निर्णायक दल को जनता हूँ जो ऊंची जात के लड़के का विवाह छोटे जात की ल़डकि के साथ होने के विरुद्ध रहते हैं, लेकिन वही मुखिया जब किसी छोटे जात के स्त्री के साथ अनैतिक संबंध बनाता है तो उसमें उसकी मान और प्रतिस्था में कोई गिरावट नहीं होता।
तुम ऐसे समाज में रहते हो जहाँ चोरी छुपे चाहो तो कितना भी अनैतिक संबंध बना सकते हो किसी भी जाति किसी भी धर्म के साथ तब तक कि वो समाज से छुपा रहे लेकिन किसी एक लिए न्यौछावर होगे तो यह अनैतिक कार्य है। अभी लव करना सही है मैरेज करना भी सही है लेकिन लव मैरेज करना गलत है।
तुम्हारे बनाये हुए नियम समाज के सामने अलग और बंद कमरे में अलग होता है ।ऐसा समाज देख कर मुझे रोना आता है।

चूंकि चौथा आयाम अंतरिक्ष और समय से बुना हुआ है इसलिए में समय यात्रा भी कर सकता हूँ।
मैं भूत में जाकर पृथ्वी को
देखता हूँ तो हरियाली ही हरियाली है और अब देखो हर कहीं धुआं धुआं। भविष्य में हरियाली के नाम पर बस खूबसूरत कन्या बचे रहेंगे। हालांकि
मैं भविष्य की बात करके तुम्हारा दिमाग खराब नहीं करना चाहता क्योंकि भविष्य की ही चिंता तुम्हें सबसे ज्यादा है।
मैं तुम्हें जन्म से मृत्यु तक देख सकता हूँ। बचपन में तुम बेफिक्र हँसते खेलते थे , अब स्वम को देखो चिंता से हाल बेहाल रहता हैं भूतकाल की चिंता जिसे तुम बदल नहीं सकते भविष्य की चिंता जिसे तुम देख नहीं सकते,
चिंताओं से तुम केवल वर्तमान का गला दबाते हो।
बचपन की महत्वाकांक्षा याद करो स्कूल में अध्यापक पूछता था बेटा क्या बनोगे तो तुम में से कोई उत्साह से बोलता था मैं डॉक्टर बन कर गरीबों की सेवा करूँगा। कोई बोलता था इंजीनियर बनकर नव निर्माण करूंगा । कोई बोलता था कलेक्टर , कितनों ने बोला राजनीतिक बन कर जनसेवा करूँगा । अब जब कुछ बन गये हो तो सेवा नहीं केवल मेवा याद आता है चाहे वो मेवा लूटने से मिले या घुस के तौर पर। लाखों की नौकरी करते हो लेकिन मिठाई तो गरीबों के पेट से पैसा निकाल कर ही खाओगे।

अब तुम सोंच रहे होगे की मैं इतना घूमता कैसे हूँ। दरअसल मेरे आवागमन का न ही पेट्रोल की कीमतों से लेना देना है
न ही यातायात नियमों से (जिसे तोड़ना तुम अपना
जन्म सिद्ध अधिकार मानते हो) और न ही प्रदूषण से।
मेरा वेग बाय डिफॉल्ट प्रकाश के वेग के आसपास है। मतलब पलक झपकते ही एक स्थान से दूसरे स्थान ।
इसे तुम जादू कह सकते हो लेकिन ये जादू नहीं तुम्हारे दिमाग का भ्रम मात्र है क्योंकि तुम्हरी दृष्टि इतना वेग देख नहीं सकता। ऐसे ही जादूगर तुम्हारे आँखों के सामने धूल झोंक कर पैसा कमा जाता है, तुम जादू देखकर खुश,
जादूगर तुम्हें मूर्ख बनाकर खुश और मैं झूठ से बना ये परिदृश्य देखकर खुश।
एक बार मैंने ब्राह्मण को नापने की कोशिश की थी पता है मैंने ब्राह्मण और मनुष्य के बुद्धि में एक समानता पाया कि ब्राह्मण का आकार अनंत है और मनुष्य की बुद्धिमत्ता भी और मूर्खता भी अनंत है।
एक ओर बुद्धिजीवी हैं जो ब्लैक होल पर चर्चा करेंगे और एक ओर समान्य इंसान है जिसका पृथ्वी गोल है या चौकोर से भी दूर-दूर तक कोई नाता नहीं ब्लैकहोल तो दूर की बात है ।
ब्रम्हांड के जटिल प्रश्नों का उत्तर एक ज्ञानवान व्यक्ति मनघड़क सिधांत से अगर देगा फिर भी एक आम आदमी को विश्वास करना होगा क्योंकि उस ज्ञानवान व्यक्ति तक पहुँचने और उसे गलत साबित करने में उसका उम्र बीत जाएगा। और वह वास्तविकता से जीवन भर अज्ञात ही रहेगा। ठीक वैसे ही जैसे गांव का जनता पंच पर चावल घोटाले जैसे चिल्लर आरोप लगाते मर जाता है लेकिन घोटाले का सबसे बड़ा स्रोत जैसे महानगर जहाँ घोटाले अरबों-खरबों मे होता है उसे जीवन भर पता नहीं चलता।

खैर छोड़ो यार मैं भी क्या बके जा रहा हूँ । तुम जैसे भी हो, तुम्हारा कृत्य जैसा भी हो, तुम्हारा समाज जैसा भी हो मुझे क्या।
अब तुम्हें देख-देख कर मेरी आदतें भी बिगड़ रही है । जैसे तुम्हें दूसरों कि जिंदगी में क्या चल रहा है कि चिंता खुद की फटी जिंदगी को रफ़ू करने से ज्यादा होता है । ठीक वैसे ही मैं भी आज-कल तुम्हारे करतूतों पर ज्यादा ध्यान देने लगा हूँ। लेकिन फिर भी मैं अपने दुष्कर्मों पर यही सोच कर अंकुश लगाता हूँ कि मुझे भी पांचवे आयाम और उससे भी ऊपर बहु आयाम वाले अदृश्य, मुझसे 1000 गुना अधिक शक्तिशाली देखकर हंसते होंगे। 

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