मिट्टी से ,मिट्टी तक सफर में।

मिट्टी से ,मिट्टी तक 
सफर में। 
 खिलखिलाते, बिलखते 
वक्त गुजरता है,
  हर पल, हर शख्स 
अपना पात्र बदलता है।
नायक खलनायक के मेले में
 सही गलत के झमेले  में 
फंसना यहां आम है
 नाम से उल्टा भी लोगों का काम है।
सिमटे सोच के दायरे में 
गुरुर करता है
फिर अकेला जान 
घुट-घुटकर मरता है।
मिलते बिछड़ते 
गिरते संभलते चलना है।
कभी शिखर, कभी समतल 
डगर में   
मिट्टी से ,मिट्टी तक 
सफर में।

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