चल अचल मत रूक एक पल ,.
चल अचल मत रूक एक पल ,.
जर्रा-जर्रा है बदल रहा रुख अपना ।.
तू भी भूल सारे बहाने, सारा दुख अपना।.
चल-अचल मत रूक एक पल,.
जर्रा जर्रा है बदल रहा रुख अपना ।.
मन तो बुलबुला है पानी का,.
बनना बिगड़ना ही इसका काम है ।.
पत्थर पिघल सकते हैं तेरे हाथों से ,.
लेकिन मन की चाह तो बस आराम है ।.
तुझे बढ़ना होगा फ़रिश्तों से थोड़ा और आगे,
जमाने में कहां तेरा नाम है ।. डगमगाने ना दे तेरे कदम अभी ,
तुझे क्षितिज को छूकर है दिखाना ।.
चल अचल मत रूक एक पल,.
जर्रा जर्रा है बदल रहा रुख अपना।
है जग रीति, जग जीता ,जग मरता ,
जग सोता जगजाता है।।
समुद्र तट मरुस्थल ,
मरुस्थल भी समुन्दर बन जाता है।
पतझड़ से दबा उपवन में ,
बहार कभी तो आता है ।
सुर -ताल कहां फिर भी ,
भंवरा तो गुनगुनाता है।
फैलते इस ब्रह्मांड में ज्यादा,
संकुचित तेरा मन मतकर।
ऐ ! विजयपथ की दीपशिखा,
बुझ मत एक पल ।
चल अचल मत रूक एक पल ,.
जर्रा-जर्रा है बदल रहा रुख अपना ।.
तु वो तिनका नही ,
जो जल की कल-कल में बहता जाये।
न ही सतह से उखड़ता वो वृक्ष ,
जो आंधियो से घबरा जाये।
तु वो परवाना हैै, जो मंजिल अगर शमा हो,
तो पाकर राख हो जाये।
संघर्ष के कुरूक्षेत्र में स्वयं सार्थी पार्थ बन।
स्थूलता स्वीकार मत ऐ! मानव तन।
असफलता के गढ्ढे़ पाट मात्र न हो प्रसन्न।
सफलता के पुण्य पंथ पर नित हो आसन्न।
आलस के आगे झुक मत एक पल
चल अचल मत रूक एक पल ,.
जर्रा-जर्रा है बदल रहा रुख अपना ।.
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